गधों का गवर्नर हिंदी कहानी

 गधों का गवर्नर हिंदी कहानी 


बादशाह आफन्ती को अपमानित करना चाहता था। उसने आफन्ती को राजमहल में बुलवाया और मंत्रियों के सामने बड़ी संजीदगी से ऐलान किया:


"आज से मैं आफन्ती को राजधानी के गधों का गवर्नर नियुक्त करता हूं।"


सब मंत्री खिलखिलाकर हंस पड़े। लेकिन आफन्ती फौरन उठ खड़ा हुआ और बड़े अदब से बादशाह को सलामी देने के बाद शान से बादशाह की गद्दी पर बैठ गया।


"यह क्या बदतमीजी है?" बादशाह ने खीझकर कहा, "तुम्हें मेरी गद्दी पर बैठने की जुर्रत कैसे हुई? फौरन उतर जाओ!"


"शोर न मचाओ! किसी गधे को मेरे सामने रेंकने की इजाजत नहीं है! सबको गधों के गवर्गेर आफन्ती का हुक्म मानना होगा!"


पैसे का मातम


आफन्ती एक बड़ी-सी नदी के किनारे अकेला बैठा था। इतने में दो मोटे-ताजे आदमी वहां आ पहुंचे। नदी पर पुल नहीं था। दोनों आफन्ती से प्रार्थना करने लगेः


"भाई साहब, हम दोनों राजधानी के सबसे बड़े सेठ हैं। हमने सुना है पड़ोस के राज्य में खूब मुनाफा कमाया जा सकता है।


इसलिए हम व्यापार करने वहां जा रहे हैं। अगर आप हमें अपनी पीठ पर बिठाकर नदी पार करा दें, तो हम आपको एक-एक य्वानपाओ देंगे।"


आफन्ती ने कहा: "नदी का बहाव बहुत तेज है, पानी भी काफी गहरा है। अगर मैं या आप दोनों बह गए, तो क्या होगा?"


"कोई बात नहीं, भाई साहब। व्यापारियों के लिए जान से ज्यादा पैसे की कीमत है।" एक सेठ ने कहा।


"इस बात की चिन्ता न कीजिए, भाई साहब। अगर हम नदी में बह भी गए तो भी आपको दोषी नहीं ठहराएंगे!" दूसरा सेठ समर्थन करता हुआ बोला।


"तो ठीक है!" आफन्ती राजी हो गया। उसने एक सेठ को नदी के उस पार पहुंचा दिया और उससे एक ग्वानपाओ वसूल कर लिया।


जब वह दूसरे सेठ को पीठ पर उठाकर मंझधार में पहुंचा, तो जानबूझकर फिसल गया और नदी में गिर पड़ा। सेठ नदी में बह गया।


उस पार खड़े सेठ ने जब "बचाओ! बचाओ।" की आवाज सुनी तो वह फूट-फूटकर रोने लगा।


आफन्ती भी उस पार पहुंचकर रोने और मातम मनाने लगा। यह देखकर सेठ ने चकित होकर पूछाः


"वह मेरा साथी था। इसलिए मैं रो रहा हूं और मातम मना रहा हूं। लेकिन आप किस बात का मातम मना रहे हैं?"


"ठीक है. आप तो अपने साथी का मातम मना रहे हैं," आफन्ती बोला, "पर मैं अपने दूसरे य्वानपाओ का मातम मना रहा हूं, क्योंकि नदी में सेठ जी के साथ वह भी बह गया है!"

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