सूझबूझ वाला सेवक आफनती के किस्से
सूझबूझ वाला सेवक आफनती के किस्से
बादशाह को पता चला कि आफन्ती एक होशियार, फुर्तीला और सूझबूझ वाला आदमी है। इसलिए उसे राजमहल में सेवक नियुक्त कर दिया। बादशाह ने उससे कहाः
"आफन्ती, जब कभी तुम्हें कोई काम दिया जाए, तो उससे सम्बन्धित बाकी सब काम तुम्हें एक साथ पूरे कर लेने चाहिए।"
शुरू-शुरू में आफन्ती ने बहुत से काम बखूबी पूरे किए। बादशाह बड़ा खुश हुआ। उसने मंत्रियों के सामने आफन्ती की तारीफ के पुल बांध दिए और उनसे कहा कि वे आफन्ती की मिसाल पर चलें।
एक दिन यकायक बादशाह गम्भीर रूप से बीमार हो गया। वह न तो खाना खा सकता था और न एक भी बूंद पानी पी सकता था। मंत्रियों ने आफन्ती को बुलाया। बादशाह कराहता हुआ बोला:
"आफन्ती, जाओ, जल्दी से किसी अच्छे हकीम को बुला लाओ। जरा भी देर न करना।"
"आप बिल्कुल बेफिक्र रहें, जहांपनाह!" आफन्ती बोला, "मैं
इससे सम्बन्धित सभी काम एक साथ पूरे करके जल्दी ही लौट
आऊंगा।"
आफन्ती ने राजधानी में जगह-जगह पूछताछ करने के बाद बादशाह का इलाज करने के लिए एक हकीम चुन लिया। फिर मस्जिद में जाकर कुरान शरीफ पढ़ने के लिए एक मौलवी बुला लाया। साथ ही एक ताबूत भी ले आया और उसे उठाने के लिए चार आदमी भी बुला लाया। सूरज डूबने तक वह बादशाह के पास लौट गया।
"हरामजादे!" ताबूत देखते ही बादशाह आपे से बाहर हो गया और थरथर कांपता हुआ बोला, "मैं अभी मरा कहां हूं? तू यह ताबूत क्यों लाया है? इस मौलवी को यहां से दफा कर और ताबूत बाहर फेंक दे!"
"जहांपनाह, गुस्सा न कीजिए, शान्त रहिए।" आफन्ती बड़े अदब के साथ झुककर बोला। "आप उल्टी सांस लेने लगे हैं। मुझे इससे सम्बन्धित एक और जरूरी काम जल्दी ही पूरा करना है-आपके लिए एक कब्र खुदवानी है!"
आफन्ती की बात सुनते ही बादशाह निरुत्तर हो गया। उसकी आंखों के सामने अंधेरा छा गया। थोड़ी देर खांसने-खखारने के बाद वह पलंग पर लुढ़क गया।
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